Friday, June 3, 2011

लोकपाल पर बिगड़ती बात


प्रकाश सिंह

प्रस्‍तुतिःडॉ0 संतोष राय


लोकपाल बिल के मसौदे पर सरकार और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों के बीच मतभेद उभरकर सामने आ गए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि बातचीत का सिलसिला भी शायद टूट जाए। अरविंद केजरीवाल ने तो यहां तक कह दिया है कि छह जून की मीटिंग के बाद, यदि गतिरोध बना रहा तो संभवत: आगे की वार्ता नहीं होगी। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। लोकपाल बिल की आवश्यकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। वर्तमान प्रशासकीय तंत्र भ्रष्टाचार को रोकने में असफल साबित हो चुका है। सरकार और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों को इस विषय पर एक सकारात्मक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। एक तरफ सरकार को अपना अड़ियल रुख त्यागना होगा तो दूसरी ओर अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों को भी यह सोचना होगा कि उनकी मांगें कितनी वांछनीय एवं व्यावहारिक हैं। जब अन्ना हजारे भूख हड़ताल पर बैठे तो उन्हें सभी वर्गो का समर्थन मिला, पर यह जनसमर्थन भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को था, न कि जन लोकपाल बिल के प्रावधानों को।

सच तो यह है कि अधिकांश लोगों ने जन लोकपाल बिल को पढ़ा ही नहीं था। बुद्धिजीवियों ने जैसे-जैसे जन लोकपाल बिल का बारीकी से अध्ययन किया, उनमें से बहुत लोगों ने इसके प्रावधानों के बारे में अपनी शंका और संदेह व्यक्त किया। एक ने तो लोकपाल को 'अयातुल्ला ऑफ एंटी करप्शन' तक कह डाला। सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों की निष्ठा और भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रतिबद्धता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता, परंतु वह लोकपाल को जितने अधिकार देना चाहते हैं और उससे जितने काम की अपेक्षा करते हैं, उसके लिए तो शायद भगवान को अवतार लेकर लोकपाल की कुर्सी पर बैठना पड़ेगा। देश में जैसे लोग आगे बढ़ जाते हैं या जिनका महत्वपूर्ण पदों के लिए चयन होता है उनको देखते हुए किसी एक व्यक्ति में इतने अधिकारों के समावेश से भय लगता है कि यदि इनका दुरुपयोग हुआ तो हम कहां जाएंगे? भारत सरकार ने लोकपाल बिल का जो प्रारूप बनाया था उसमें प्रधानमंत्री को भी उसके दायरे में रखा था, यद्यपि यह स्पष्ट किया गया था कि उनके ऐसे कार्य जो राष्ट्रीय रक्षा या सुरक्षा, अन्य देशों से संबंध और लोकव्यवस्था को बनाने से संबंधित हैं, लोकपाल की जांच के दायरे में नहीं आएंगे। 30 मई की बैठक में सरकार इससे मुकर गई और कपिल सिब्बल ने कहा कि यदि ऐसा हुआ तो प्रधानमंत्री 'बेकार' हो जाएंगे। अपने ही बनाए बिल के प्रावधानों पर सरकार का पीछे हटना दुर्भाग्यपूर्ण है। भ्रष्टाचार को लेकर देश की अंतरराष्ट्रीय जगत में प्रतिष्ठा गिरी है, फिर भी सरकार का नकारात्मक रुख अपनाना खेद का विषय है। सरकार का यह कहना भी कि संसद में किए जाने वाले भ्रष्टाचार की जांच लोकपाल न करे, सही नहीं प्रतीत होता। संसद में जो भ्रष्टाचार चलता है-जिस तरह से नोटों की गड्डियां दिखाई जाती हैं, पैसे लेकर प्रश्न पूछे जाते हैं वह सब आम जनता को मालूम हो चुका है। सांसदों के इन कृत्यों को लोकपाल के दायरे में अवश्य होना चाहिए।

दूसरी तरफ कुछ मुद्दे ऐसे हैं जहां सरकार की आपत्तियों को एकदम से नकारा नहीं जा सकता। जैसे सरकार की यह दलील है कि उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाए। यह सही है कि उच्च न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार घुस गया है, परंतु हमें ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे उच्च न्यायपालिका की स्वतंत्रता को किसी प्रकार का आघात पहुंचे। आज की तारीख में यही एक संस्था बची है जिसका दरवाजा, न्याय की आशा में कोई नागरिक आखिर में खटखटाता है। उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन की बात हो रही है। अच्छा होगा यदि हम न्यायपालिका को ही अपना घर साफ रखने की जिम्मेदारी दें। जन लोकपाल बिल में लोकपाल के कार्यक्षेत्र में पटवारी से लेकर प्रधानमंत्री तक सभी अधिकारी आ जाते हैं। सवाल यह है कि क्या लोकपाल इतनी बड़ी जिम्मेदारी को निभा सकेगा? इस मुद्दे पर भी सरकार की इस बात में दम लगता है कि लोकपाल संयुक्त सचिव और उससे बड़े अफसरों के खिलाफ ही जांच करे। भ्रष्टाचार के महिषासुर अगर मार दिए जाएंगे तो छुटभैये अपने आप रास्ते पर आ जाएंगे। वास्तव में हमें लोकपाल विधेयक में ही लोकायुक्त के अधिकारों की भी व्याख्या कर देनी चाहिए। भारत सरकार ने हाल ही में यूएन कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन की भी पुष्टि कर दी है। इसके अंतर्गत संसद को यह अधिकार होगा कि वह सारे देश के लिए भ्रष्टाचार विरोधी कानून बना सके। लोकपाल और लोकायुक्त एक ही बिल की कड़ी होनी चाहिए-लोकपाल केंद्रीय स्तर पर और लोकायुक्त प्रदेश स्तर पर।

जन लोकपाल बिल में भ्रष्टाचार के अतिरिक्त शिकायतों के निस्तारण का भी प्रावधान है। इसके अंतर्गत कोई व्यक्ति जो यह शिकायत करता है कि 'सिटिजन चार्टर' में प्रदत्त अधिकारों से उसे वंचित रखा जा रहा है तो इस शिकायत का भी निस्तारण लोकपाल एक समय सीमा के अंतर्गत करेंगे। देश की 120 करोड़ की आबादी में कम से कम सौ करोड़ व्यक्ति ऐसे होंगे जिन्हें कोई न कोई शिकायत होगी। अगर इनमें से एक करोड़ व्यक्तियों ने भी अपनी शिकायतों की दरख्वास्त लोकपाल को भेजी तो बेचारा लोकपाल तो कागजों के समुद्र में गोता ही लगाता रह जाएगा। जिन आकांक्षाओं को हम पूरा नहीं कर सकते उनके बारे में जनता के मन में आशा जगाना गलत होगा। आकांक्षाओं के पूरा न होने पर जनमानस में भयंकर कुंठा और आक्रोश होगा।

जन लोकपाल बिल में यह भी कहा गया है कि सीबीआइ की जो अन्वेषण शाखा है उसे लोकपाल के नीचे लाया जाए। लोकपाल को जांच के लिए एक अन्वेषण शाखा अवश्य चाहिए, परंतु उसके लिए सीबीआइ का एक हाथ काटना उचित नहीं होगा। सीबीआइ जिन कारणों से राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अभियोगों की विवेचना निष्पक्ष ढंग से नहीं कर पाती है उन्हें हमें ईमानदारी से समझना होगा और उन दिक्कतों का समाधान निकालना होगा। यह सही है कि लोकपाल को एक अन्वेषण शाखा की आवश्यकता होगी। ऐसी हालत में उन्हें राज्यों से या सीबीआइ से भी कुछ जांच अधिकारी दिए जा सकते हैं।

यदि लोकपाल बिल पर सहमति नहीं बनी तो इसका परिणाम सरकार के लिए भयंकर होगा। सारे देश में आंदोलन की जो लहर उठेगी उससे निपटना सरकार के लिए मुश्किल हो जाएगा। दूसरी ओर सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों को भी व्यावहारिक होना पड़ेगा। लोकपाल को उतनी ही जिम्मेदारी दी जाए जिसको वह निभा सके और जिसके सकारात्मक परिणाम का व्यापक असर पड़े। भ्रष्टाचार पर हमें प्रभावी अंकुश लगाना पड़ेगा और इसके लिए एक सशक्त लोकपाल का होना अत्यंत आवश्यक है।

[प्रकाश सिंह: लेखक उप्र के पूर्व डीजीपी हैं]
दैनिक जागरण से साभार

No comments: